History of Chhattisgarh in Hindi छत्तीसगढ़ का इतिहास (प्राचीन) नामकरण

छत्तीसगढ़ राज्य में  सामान्य ज्ञान के अन्तर्गत छत्तीसगढ़ का इतिहास  history of Chhattisgarh in Hindi  छत्तीसगढ़ के

जनरल नॉलेज आपके सामने प्रस्तुत है उम्मीद है यह सामान्य जानकारी आपको पसंद आएगी

छत्तीसगढ़ का इतिहास -History of Chhattisgarh in Hindi

  1. प्राचीन काल (Cg History in Hindi -Ancient Period )
  2. history of Chhattisgarh in Hindi

 

  • छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में दक्षिण कोसल कहा जाता था।
  • छत्तीसगढ़ में पाषाण कालीन अवशेष पाये जाते हैं । चितवाडोंगरी, (राजनांदगांव) अर्जुनी (दुर्ग) में नव पाषाण कालीन अवशेष मिले हैं।
  • यहां “सिन्धु सभ्यता” से संबंधित कोई स्थल प्राप्त नहीं हुआ है न ही इसके अवशेष मिले हैं।
  • रायगढ़ जिले में सिंघनपुर एवं काबरा पहाड़ी से प्रागैतिहासिक काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • दुर्ग जिले के धनोरी एवं करकाभाठा से महापाषाण स्मारक (डॉलमेन समाधी) प्राप्त हुई है।
  • ऋग्वेद में कोशल का कोई उल्लेख नहीं मिलता अर्थात् ऋग्वेद में विंध्य पर्वत एवं नर्मदा (रवा) नदी का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
  • सर्वप्रथम इनका उल्लेख “कौशीतिकी उपनिषद” में हुआ है।
  • महाकाव्यों में कोसल का व्यापक उल्लेख हुआ है।

रामायण काल में छत्तीसगढ़ का इतिहास Chattisgarh ka Itihas

  • छत्तीसगढ़ राज्य में रामायण काल या सूत्रकाल या महाकाव्य काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • रामायण में “दक्षिण कोसल का नाम मिलता है। यहां का राजा “भानुमंत” था। भगवान राम की माता कौशल्या भानुमंत की पुत्री थी।
  • राम के पश्चात उत्तर कोसल का राज्य, जिसकी राजधानी “श्रावस्ती’ थी, उसके ज्येष्ठ पुत्र “लव’ को एवं “दक्षिण कोसल’ का राज्य राम के दूसरे पुत्र ‘कुश’ को मिला। जिसकी राजधानी“कुशस्थली”थी।
  • महाभारत काल में ऋषभतीर्थ (जिसकी पहचान सक्ती के निकट गुंजी नामक स्थान की जाती है।) का उल्लेख हुआ है।
  • इस काल में छत्तीसगढ़ को-“चेदिसगढ़” कहा जाता था ।
  • मोरध्वज एवं ताम्रध्वज की राजधानी- मणिपुर (रतनपुर) थी।
  • महाभारत काल में यहां का राजा अर्जुन का चित्रांगदा सेउत्पन्न पुत्र बभ्रुवाहन था जिसकी राजधानी- सिरपुर थी।
  • महाजनपद काल में-“दक्षिण कोसल” एक जनपद था।

नलवंश के  समय Cg History In Hindi

  • नलवंशों की राजधानी- पुष्करी (भोपालपट्टनम) थी। दक्षिण कोसल का क्षेत्र मौर्यों के अधीन था अशोक कालीन लिपी एवं भाषा (ब्राह्मी लिपी एवं पाली भाषा) के लेख सरगुजा जिले के रायगढ़ पहाड़ी में स्थित जोगीमारा एवं सीताबेंगरा की गुफाओं से प्राप्त हुए हैं,
  • इस गुफा में सुतनुका नामक देवदासी एवं उसके प्रेमी देवदत्त का उल्लेख मिलता है ।
  • सीताबेगरा विश्व की प्राचीनतम नाट्य शाला मानी जाती है।
  • चीनी यात्री व्हेनसाँग के अनुसार बौद्ध भिक्षु नागार्जुन के लिए एक सातवाहन राजा ने दक्षिणी कोसल के राजा ने पाँच मंजिला भव्य संघाराम का निर्माण करवाया था।
  • किरारी (जांजगीर-चाँपा) से काष्ठस्तंभ लेख प्राप्त हुआ है जो कि सातवाहन काल का है।

छत्तीसगढ़ का इतिहास गुप्तकाल में 

  • गुप्तकाल में समुद्र गुप्त के “प्रयाग प्रशस्ति में’कोसल के राज” महेन्द्र” का उल्लेख हुआ है। यह गुप्तों के अधीन था ।
  • पुलकेशिन-II के एहोल अभिलेख” में (रविकीर्ति द्वारा रचित) नलवंशी शासकों का उल्लेख मिलता है।

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छत्तीसगढ़ के शासक व उनकी उपलब्धि 

  • राजिम के “राजीव लोचन मंदिर” का निर्माण 700-7 40 ई. में नलवंशी शासक- बिलासतुंग द्वारा करवाया गया था जो वैष्णव धर्म को समर्पित है।
  • इस मंदिर का जीर्णोद्धार पृथ्वीदेव द्वितीय के सामंत जगपाल ने करवाया था।
  • शरभवंशी शासक प्रसन्नमात्र ने निडिला (लीलानगर) नदी के तट पर प्रसन्नपुर नामक नगर बसाया, जिसकी तुलना मल्हार से की जाती है।
  • शरभवंशी शासक प्रवरराज प्रथम ने श्रीपुर (सिरपुर) को अपनी राजधानी बनाया। बाद में सोमवंशी (या पांडुवंशी) शासकों ने दक्षिण कोशल में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया।
  • सोमवंशी शासक- महाशिव गुप्ता बालार्जुन का काल 595-655 ई. “छत्तीसगढ़ या दक्षिण कोसल के इतिहास का स्वर्णकाल’ माना जाता है।
  • इसी के काल में 639 (या 635-640) ई. में चीनी यात्री व्हेनसांग ने सिरपुर की यात्रा की थी। महाशिवगुप्त बालार्जुन प्रसिद्ध वर्धन सम्राट हर्षवर्धन का समकालीन था।
  • इनकी “माता वासटा देवी” ने शैवधर्म की होते हुए विष्णुदेव को समर्पित “सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर” का निर्माण करवाया था।
  • पाली में खजुराहो शैली के बने मंदिर का निर्माण – बाण वंशीय शासक-“विक्रमादित्य’ ने(870-895 ई.)करवाया था। बाद में जीर्णोद्धार- कलचुरी शासक’ जाजल्लदेव प्रथम (1095-1120 ई.) ने करवाया था।

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  • इसके बाद हैहयवंशी शासकों की जो कलचुरी शासक कहलाये जिसकी राजधानी त्रिपुरी (जबलपुर) थी का उत्कर्ष हआ इस वंश का संस्थापक “कोकल्ल प्रथम” एक शक्तिशाली शासक था जिसके विजयों का उल्लेख “बिलहरी लेख’ में हुआ है।
  • छत्तीसगढ़ में कल्चुरी सत्ता स्थापित करने का श्रेय-“क राज” को जाता है । जिसने 1000 ई. के आसपास “तुमांन” (तुमाण) को राजधानी बनाया।
  • इसके पश्चात “रत्नदेव प्रथम (1020-1045 ई०) ने रत्नपा (रतनपुर) की स्थापना की थी और तुमान के स्थान पर रतनपुर ‘ को अपनी राजधानी बनवाई।
  • इन्होंने ही 1045 -50 ई- के आसपास 11वीं सदी में रतनपर के “महामाया मंदिर’ का निर्माण किया।
  • रतनपुर महाभारत काल में हीरापुर” कहलाती थी।
  • कलचुरीवंशी शासक-“पृथ्वीदेव-I ने “सकल कोसलाधिपति‘ की उपाधि धारण की थी।
  • कलचुरी वंश शासक-‘जाजल्लदेव’ प्रथम ने- जाजल्लपर (जांजगीर) नगर की स्थापना की। इसने “पाली’ के शिवमंदिर” का पुनर्निर्माण करवाया था।
  • रत्नदेव-II के शासनकाल (1120-1135 ई०) में उड़ीसा के गंगशासक-अनंत वर्मन चोड गंग (इन्होंने जगन्नाथ मंदिर पुरी का निर्माण करवाया) को शिवरीनारायण के पास पराजित होना पड़ा।
  • रत्नदेव- III के शासनकाल (1178-1198 ई०) में “खरौद के प्रसिद्ध मंदिर “लक्ष्मणेश्वर मंदिर’ का निर्माण उसके प्रधानमंत्री गंगाधर ने करवाया था।
  • जिसकी जानकारी मंदिर में ही उत्कीर्ण खरौद शिलालेख से होती है।
  • कलचुरी वंश के शासक- बाहरसाय या बाहरेन्द्रसाय (14801525 ई०) ने कोसंगा (कोसगढ़, वर्तमान- छुरी) को अपनी राजधानी बनाया।
  • कल्चुरी शासक कल्याणसाय (1544-1581 ई०) ने बिलासपुर में पहले अंग्रेज बंदोबस्त अधिकारी-“चिशम” की नियुक्ति की गयी और इसके द्वारा दक्षिण कोसल में (छत्तीसगढ़) में “जमाबंदी (राजस्व प्रद्धति)” की शुरुआत की। वह-“अकबर’ का सम कालीन था और उसने अकबर के दरबार में 8 साल बिताए थे ।

छत्तीसगढ़ राज्य  का उल्लेख या नामकरण 

छत्तीसगढ़ का नाम छत्तीसगढ़ कैसे पड़ा ?

  • 17 वीं सदी में इस वंश के शासक- “तखतसिंग ने “तखतपुर’ नामक शहर की स्थापना की। 18 वीं सदी में यहां का “राजा राजसिंह” हुआ जिसके दरबार में “खूबतमाशा‘ के लेखक एवं प्रसिद्ध कवि “गोपालचन्द्र मिश्र’ निवास करते थे।
  • इनके इसी ग्रंथ मेंली बार “दक्षिण-कोसल’ के लिये छत्तीसगढ़ राज्य का” उल्लेख किया है।
  • कुछ विद्वान 36 गढ़ के कारण छत्तीसगढ़ का होना बताते हैं

रायपुर शाखा के गढ़ –  (1)रायपुर (2)सिंगारपुर (3)दुर्ग (4)मोहदी (5)फिंगेस्वर  (6) सुअरमार  (7)पाटन (8)लवन  (9)सारधा ,

(10) खलारी (11)राजिम (12) टेंगनगढ़ (13)सिमगा (14)अमोरा (15)सिरसा (16)सिरपुर (17) सिंगनगढ़  (18)एकलवार

रतनपुर शाखा के गढ़ -(1)रतनपुर,(2) खरौदगढ़ (3)सोंठीगढ़ (4)मदनपुर(5) ओखर गढ़(6) कर -करी (7)मारो (8)कोटगढ़ (9)पंडर भट्टा

(10)लाफागढ़ (11)मातिनगढ़ (12)केंदागढ़ (13)विजयपुर(14) नवागढ़(15) सेमुरिया गढ़ (16)कोसईगढ़(17) उपरोड़ा गढ़ (18)पेंड्रा गढ़

प्रथम मराठा आक्रमण व मराठा शासक 

  • दक्षिण कोसल पर आक्रमण करने वाला पहला मराठा सेनापति भास्कर पंत था जिसने उड़ीसा अभियान के दौरान 1741 ई० में रतनपुर पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया था।
  • 1798 ई० में बिम्बाजी राव भोसले ने छत्तीसगढ़ में प्रथम मराठा शासक के रूप में प्रत्यक्षतः शासन की स्थापना की।
  • उसने रतनपुर को राजधानी बनाकर शासन किया।
  • कल्चुरियों के शासनकाल में- खल्लारी में 1415 ई. में “देवपाल’ ने “नरनारायण मंदिर” (नारायण मंदिर)का निर्माण करवाया था।
  • यह छत्तीसगढ़ राज्य में सर्वधर्म समन्वय का पहला उदाहरण है।
  • कवर्धा (कबीरधाम में) के फणिनागवंशी शासकगोपालदेव ने भोरमदेव’ के मंदिर का निर्माण- 1089 ई. में करवाया।
  • जबकि मड़वा महल का निर्माण 1349 ई. में इसी वंश के शासक- “रामचन्द्रदेव’ ने करवाया।
  • कल्चुरी काल में “धोर’ नामक चांदी का सिक्का विनिमय माध्यम के रुप में प्रयोग किया जाता था।
  • कल्चुरी शासकों के सिक्के पर “लक्ष्मी’ की आकृति उत्कीर्ण होती थी।
  • बाबू रेवाराम ने- तवारीख-ए-हैहयवंशी, विक्रमविलाश, गीतामाधव, रामायण दीपिका की रचना की।
  • शिवदत्त शास्त्री ने- “रतनपुर आख्यान’ लिखा जिसमें जींदारों का इतिहास लिखा है तथा इन्होंने ही “इतिहास सम्मुच्चय” की रचना की।
  • गज लक्ष्मी कल्चुरी वंशी की कुलदेवी थी ये शैव उपासक भी थे। इनके सिक्कों पर “लक्ष्मी देवी अंकित” होती थी
  •  ताम्रपत्र का प्रारंभ” ओम् नम: शिवाय: से होता था।

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