Earth Age Determination Methods in Hindi पृथ्वी की आयु ज्ञात करने की विधियां

Earth Age Determination Methods in Hindi पृथ्वी की आयु ज्ञात करने की विधियां

पृथ्वी के आयु निर्धारण के अनेक सिद्धांत प्रतिपादित है Earth Age Determination Methods in Hindi-पृथ्वी की आयु ज्ञात

करने की विधियां जिनको हम इस लेख द्वारा समझने का प्रयास करेंगे

हमारे लिए बड़ा कौतहुल व जिज्ञाशा का प्रश्न होता है की कैसे किसी सिद्धांतो को मान्यता मिलती है तो यंहा पृथ्वी के आयु निर्धारण

के  कुछ वैज्ञानिक अवधारणाए है उम्मीद है आप को कुछ जानकारी मिलेगी

पृथ्वी की आयु ज्ञात करने की विधियां  -Earth Age Determination Methods in Hindi

हमारी पृथ्वी  की आयु ज्ञात करने सम्बन्धी आधुनिक धारणाओं का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है

(1) पृथ्वी की शीतलन की गति के अनुसार-लार्ड केल्विन ने भौतिक विज्ञान की सहायता से पृथ्वी की आयु जानने का प्रयास किया था।

पृथ्वी की उत्पत्ति अत्यन्त तप्त गैसीय पदार्थों से हुई है जो क्रमश: ठण्डा होकर द्रव तथा दृढ़ रूप में परिवर्तित होता है।

अतः लार्ड केल्विन ने पृथ्वी की ठोस पर्पटी के आरम्भिक उच्च ताप का अनुमान लगाया तथा इस ताप के निरन्तर घटाव या शीतलन

की गति के अनुसार उन्होंने पृथ्वी की आयु 4 करोड़ वर्ष निर्धारित की थी।

(2) अवसादों के निक्षेपण की गति के अनुसार (Rate of Deposition of Sediments) यदि अवसादों की कुल मोटाई

एवं उनके निक्षेपण की दर ज्ञात हो जाये तो उनको अवसादित होने में लगे समय का आकलन किया जा सकता है।

यह समय ही पृथ्वी की आयु होगी। सर्वप्रथम सर आर्कीवाल्ड गीकी ने इस विधि के द्वारा पृथ्वी की आयु 40 करोड़ वर्ष निर्धारित की।

(3) महासागरों की लवणता के अनुसार (Salinity of the oceans)

सर्वप्रथम सन् 1898 में एडवर्ड हेली (Edward Hailey) एवं जॉली (Joly) ने इस विधि द्वारा महासागरों की आयु निकालने का प्रयास किया।

उनके मतानुसार प्रारम्भिक महासागरों के जल में लवणता का सर्वथा अभाव था।

धीरे-धीरे महासागरों के जल में लवणता की वृद्धि होती गयी। महासागरों में विद्यमान कुल लवण एवं लवण में वृद्धि

की दर की सहायता से लवण की कुल मात्रा निकाली जाती है।

इस विधि द्वारा अनुमानित आयु 10 करोड़ वर्ष मानी गयी है।

(4) जीवाश्मीय प्रमाणों के अनुसार (Paleontological Evidence)जीवाश्मों की सहायता से विभिन्न शैलों का

सह-संबंध स्थापित किया जाता है।

अत: इन जीवाश्मों की सहायता से शैलों की तुलनात्मक आयु भी निर्धारित की जा सकती है।

संभवतः जीव की उत्पत्ति लगभग 300 करोड़ वर्ष पहले हुयी। इस प्रकार पृथ्वी की उत्पत्ति 300 करोड़ वर्ष पहले ही हुयी होगी।

(5) विघटनाभिक विधियाँ (Radio-active methods)-अर्ध आयुकाल

भू-पर्पटी में विघटनाभिक तत्व विद्यमान हैं तथा उनका सतत एवं स्वत: विघटन होता रहता है।

इस विशिष्टता के कारण वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की निरपेक्ष आयु ज्ञात करने का उपाय खोजा।
विघटन एक अत्यन्त मन्द तथा सतत क्रिया है और बाह्य ताप, दाब एवं रासायनिक द्रव्यों से यह अप्रभावित रहती है।

इससे जनित सीसा और हीलियम भी स्थायी तत्व हैं।

विघटनाभिक तत्व के प्रत्येक परमाणु के नाभिक के अर्द्ध भाग के विघटन की अवधि को अर्द्ध आयु (half life) कहते हैं।

प्रमुख रेडियोऐक्टिव विधियाँ निम्नानुसार हैं

(1) यूरेनियम 238-                  सीसा 208 विधि
(2) यूरेनियम 235-                 सीसा 207 विधि
(3) थोरियम 232-                   सीसा 206 विधि
(4) सीसा विधि
(5) हीलियम विधि
(6) रूबीडियम 87 –              स्ट्राशियम 87 विधि
(7) पोटेशियम 40                    आर्गन 40 विधि
(8) कार्बन विधि

आर्थर होम्स ने समस्त निर्धारणों एवं आंकलनों के पश्चात् भू-पर्पटी की आयु 3.4 x10 9 वर्ष ठहराई है किन्तु पृथ्वी की उत्पत्ति भू-पर्पटी के ठोस रूप में आने से पूर्व ही हुई होगी।

अत: आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर 5 x 109 अर्थात् 5 अरब वर्ष मानी जाती है।

 

पृथ्वी के उत्त्पति से संबंधित भी अनेक अवधारणा विद्यमान है जिसका हम पुराने लेख में वर्णन कर चुके हैं

Earth Age Determination Methods in Hindi -रेडियोएक्टिव-

भू-पर्पटी के शैलों में विघनाभिक(रेडियोएक्टिव ) तत्वों की कुछ न कुछ मात्रा अवश्य ही रहती है।

इनमें यूरेनियम (U), रेडियम (Ra), थोरियम (Th), पोटेशियम (K) इत्यादि तथा उनके समस्थानिक प्रमुख हैं।

समय के साथ-साथ वे विघटनाभिक तत्व स्वत: विघटित होते हैं एवं सीसा (pb) तथा हीलियम (He) की उत्पत्ति होती है।

विघटनाभिक तत्व का तत्वान्तरण (Transmutation) निम्न रूप से होती है

U235 -→Ph 207; U238 → Pb206; Th232 → Pb208

यह विघटन एक अत्यन्त मन्द तथा सतत क्रिया है और बाह्य ताप, दाब एवं रासायनिक द्रव्यों से यह अप्रभावित रहती है।

इस क्रिया की गति भी स्थिर एवं सामान्यतः अपरिवर्तनशील है तथा इससे जनित सीसा और हीलियम भी स्थायी तत्व हैं।

विघटनाभिकता के इस विशेष गुण के कारण शैलों की निरपेक्ष आयु निर्धारित की जा सकती है।

प्रत्येक विघटनाभिक तत्व के विघटन की एक निश्चित गति होती है।

विघटनाभिक तत्व के प्रत्येक परमाण के नाभिक या न्यूक्लियस के अर्ध भाग के विघटन की अवधि को अर्ध आयु (Half life) कहते है।

इस तरह थोरियम के परमाणु की अर्ध आयु 1.4 x107 वर्ष है। यूरेनियम U238 अर्ध  आयु 4.57 x 109 वर्ष तथा  U235 की अर्ध आयु 7.13 x 108 वर्ष है

 

शैलों के अत्यत सावधानी पूर्ण एवं अतिसूक्ष्म विश्लेषण के अनुसार विघटनाभिकता से उत्पन्न सीसा तथा हीलियम की मात्रा तथा विघटनाभिक तत्वों के अविघटित भागों की मात्रा ज्ञात की जा सकती है।

इन्हीं तथ्यों के आधार से शैलों की निरपेक्ष आयु का परिकलन या निर्धारण किया जाता है।

पृथ्वी की आयु ज्ञात करने की विधियां

(i) U238,,U235 तथा Th232 मुख्यतः सीसा एवं हीलियम में तत्वान्तरित होते हैं। अत: इस विघटनाभिक तत्वों के

आधार पर सीसा विधि तथा हीलियम विधि से आयु का निर्धारण किया जाता है।

(ii) आर्गन विधि (Argon Method)-पोटैशियम का विघटनाभिक समस्थानिक जिसका परमाणु भार 40 है।

मुख्यत: उसी परमाणु भार के आर्गन में तत्वान्तरित होता है।

अत: Ar40 तथा K40 समस्थानिकों के अंशों को ज्ञात करके उनके अनुपात के आधार पर शैलों की आयु परिकलित की जाती है।

इस विधि को आर्गन विधि कहते हैं।

(iii) रुबिडियम स्ट्रानशियम विधि (Rubidium-Strontium Method) पेग्माटाइट शैलों में पाये जाने वाले लेपिडोलाइट अभ्रक में

रूबिडियम का कुछ अंश विद्यमान रहता है। इसी की सहायता से शैलों की आयु का परिकलन किया जाता है, जिसे रूबिडियम स्ट्रॉन्शियम विधि कहते हैं।

(iv), कार्बन विधि (Carbon Method)

भू-वैज्ञानिक दृष्टि से अपेक्षाकृत नव-निर्मित शैलों की आयु-निर्धारण के लिए कार्बन-विधि का प्रयोग किया जाता है।

वायुमण्डल में विघटनाभिक समस्थानिक C14 विद्यमान रहता है एवं इसकी अर्ध आयु 5568 वर्ष होती है।

वायुमण्डल में अन्तरिक्ष किरणों के प्रभाव के कारण न्यूट्रॉन बनते हैं जो नाइट्रोजन के समस्थानिक N14 से प्रक्रिया करके विघटनाभिक कार्बन के समस्थानिक बनाते हैं।

अपने जीवन काल में पेड़ पौधे Co2 के साथ इस विघटनाभिक कार्बन का वर्गीकरण (Assimilate) करते हैं।

जीवित काल में पेड़ पौधों में विघटनाभिक तथा अविघटनाभिक कार्बन के अंशों में कोई परिवर्तन नहीं होता है

परन्तु मृत पेड़-पौधों के क्रमशः क्षय के कारण विघटनाभिक कार्बन का अंश क्रमश: कम होता जाता है।

अत: पेड़-पौधों के जीवाश्मों में विघटनाभिक कार्बन के अंश की उपस्थिति से उसकी निरपेक्ष आयु ज्ञात की जा सकती है।

इस तरह इन जीवाश्मों की आयु से शैलों की आयु भी निर्धारित की जा सकती है। आयु निर्धारण की इस विधि को ही कार्बन विधि कहते हैं।

विभिन्न स्थानों में पाये जाने वाले प्राचीनतम शैलों की निरपेक्ष आयु के निर्धारण से यह स्पष्ट हो जाता है कि

पृथ्वी के प्राचीनतम शैलों की औसत आयु प्राय:    3.5 × 109 वर्ष है परन्तु पृथ्वी की सृष्टि इन शैलों से कहीं अधिक समय पहले हुई होगी।

आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर पृथ्वी की आयु प्राय: 5 x 109 अर्थात् प्राय: 5 अरब वर्ष मानी जाती है।

कुछ सामान्य जानकारी (परिभाषाओं का अर्थ )

अवसाद – मिटटी के कण अपक्षय ,अपरदन या टूटने के कारण या बहकर किसी स्थान पर एकत्र होकर पत्थर का रूप

ले लेते ये अवसाद से बने पत्थर है -उदाहरण बलुवा पत्थर ,चुना पत्थर अर्थात वे अवसाद निर्मित है इनसे बने चट्टान अवसादी शैल कहलाते हैं

समस्थानिक-ऐसे तत्त्व जिनके परमाणु क्रमांक समान होते है परन्तु परमाणु भार अलग अलग होता है

उदाहरण यूरेनियम 238,यूरेनियम 235

जीवाश्म -हजारो वर्षो से जमीन में दबे जीवो के अंश जो अब हमें मिलते हैं

उदा . डायनासोर के अवशेष

तो यह सब थी यदि Earth Age Determination Methods in Hindi-पृथ्वी की आयु ज्ञात करने की विधियां

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