Chattisgarhi- सुप्रसिद्ध छत्तीसगढ़ की फ़िल्में व राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय फिल्मी कलाकार

छत्तीसगढ़ी(Chattisgarhi) फिल्मो की ऐतिहासिक व वर्तमान की कुछ जानकारी  जिसे आप जरूर जानना चाहेंगे

 

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छत्तीसगढ़ की  फ़िल्में  (Chattisgarhi Films) व फिल्मी कलाकार 

छत्तीसगढ के कुछ प्रतिभा संपन्न व्यक्यिों ने भी फिल्मों का निर्माण किया जिसमें से प्रमुख किशोर साह जिन्होंने

नदिया के पार‘ नामक फिल्म दिलीप कुमार, कामिनी कौशल को लेकर बनायी थी।

क्रांति लाल राठौर- गुजराती में “कंकू‘ नामक फिल्म बनायी। जिनके लिये राष्ट्रीय फिल्म समारोह में क्षेत्रीय भाषा के

सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिये स्वर्ण कमल प्रदान किया गया था।

छत्तीसगढ़ की पहली छत्तीसगढ़ी  फिल्म

कहि देबे संदेश (1965) थी। निर्देशक- मनुनायक, गायक- मो. रफी व सुमन कल्याणपुर तथा गीतकार हेमंत नायडू

व संगीतकार मलय चक्रवर्ती थे।

दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म
छत्तीसगढ़ की दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म थी-घर द्वार‘ थी, जिसके निर्देशक- निर्जन तिवारी तथा निर्माता जय पांडेय थे।
छत्तीसगढ़ की पहली सिनेमा स्कोप व व्यावसायिक दृष्टि से सबसे सफल फिल्म- “ मोर छइंहा भुईयाँ (2000) थी।

इसके निर्माता- प्रेमचंद्राकर, निर्देशक- सतीश जैन ।

छत्तीसगढ़ी (Chattisgarhi) कलाकारों के हितों की सुरक्षा एवं राज्य की कला, संस्कृति को बनाये रखने के उद्देश्य से

– सिटवा (छ.ग. सिने एंड टेलीविजन आर्टिस्ट एसोसियेशन) का गठन किया गया है।

फिल्म सिटी की स्थापना (Chattisgari Film City)

छत्तीसगढ़ में फिल्मों को बढ़ावा देने के लिये फिल्म सिटी की स्थापना ग्राम- पंचेड़ा (रायपुर) में की गयी है।
प्रदेश में बालीवुड की तर्ज पर छालीवुड (मीडिया द्वारा प्रदत्त नाम) बनाया गया है, इसके लिये फिल्म सिटी

एवं विकास निगम की स्थापना की गई है।

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध नाटककार शंकर शेष की दो कहानियों “घरौंदा” व “दूरियाँ‘ पर फिल्मों का निर्माण किया गया है।
निर्देशक रवि चौधरी के फिल्म “मोर संग चलव’ में छत्तीसगढ़ की पलायन की समस्या को उठाया गया है।

छ.ग. के रंगकर्मी Chattisgarhi Actor

नाट्य शास्त्र के रचयिता- भरतमुनि माने जाते हैं । शास्त्रों में नाट्य को पांचवें वेद की संज्ञा दी गयी है।

स्वतंत्रता काल में दीनबंधु के “नील दर्पण“, बंकिमचंद्र के “आनंदमठ‘ व भारतेंदु हरिशचंद्र के “भारत दुर्दशा”

जैसे नाटकों ने आम जनता में एक ऐसी चेतना जागृत की जो नाटक के महत्त्व को प्रतिपादित करती है।

नाटक के महत्व को देखते हुए 1943-44 में “इप्टा” जन नाटक संघ का गठन किया गया था। विश्व के सर्वोच्च हस्तियों

में सत्यजीत रे, बलराज साहनी इसके सदस्यों में प्रमुख थे।

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प्राचीनतम नाट्य शाला

विश्व की प्राचीनतम नाट्य शाला छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के रायगढ़ पहाड़ी पर स्थित- सीताबेंगरा है जो

ई.पू. 2-3 शताब्दी के आसपास स्थापित हुई थी।

छत्तीसगढ़ के आधुनिक रंगमंच की प्रकृतियों के आरंभ का श्रेय पद्म भूषण हबीब तनवीर को जाता है। जिन्होंने इप्टा

से पृथक होकर 1954 में दिल्ली में हिन्दुस्तान थियेटर की स्थापना की। इसके बाद 1959 में इन्होंने छत्तीसगढ़ी कलाकारों

को लेकर “नया थियेटर’ की स्थापना की।

habib tanveer

हबीब तनवीर के साथ काम करने वाले छत्तीसगढ़ी कलाकार मुख्यत: “चंदैनी गोदा’ के कलाकार थे।

राष्ट्रीय पुरस्कार

रायपुर के अशोक मिश्र ने “भारत एक खोज” व “सुरभि” की पटकथा लिखी है। इन्हें 2000 में “समर‘ फिल्म के लिये

राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।

बिलासपुर के “शंकर शेष’ (नागोराव शेष के पुत्र)- की रचना “घरौंदा” एवं “दूरियाँ’ पर फिल्म बन चुकी है। इनके नाटक

– “अरे ओह मायावी सरोवर” को सबसे ज्यादा प्रसिद्धि मिली। इनके अन्य नाटकों में रक्तबीज, एक और द्रोणाचार्य, बिन

पानी के द्वीप, कोमल गांधार, मूर्तिकार, बेटों वाला बाप, नई सभ्यता के नये नमूने, बाढ़ का पानी, चंदन का दीप, बंधन अपने

-अपने भी प्रसिद्ध हैं। इनका प्रथम एवं अंतिम उपन्यास “धर्म कुरुक्षेत्र” उन्होंने महाभारत के पात्रों को आधार मानकर लिखा है।

सत्यदेव दुबे

बिलासपुर के सत्यदेव दुबे निर्देशक, अभिनय, निर्माण में छत्तीसगढ़ का नाम ऊँचा किये हुए हैं। इन्हें म.प्र. का शिखर सम्मान

तथा महाराष्ट्र का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ निर्देशक) प्राप्त हुआ है।

जयंतशंकर देशमुख
रायपुर के जयंतशंकर देशमुख- इन्होंने अनेक नाटकों का निर्देशन किया है। इन्होंने कारंत, जान मार्टिन व बंशी कौल

जैसे प्रसिद्ध निर्देशकों के साथ कार्य किया। इन्होंने बहुचर्चित फिल्म – “बैंडिट क्वीन‘ में अभिनय किया।

नाचा कलाकार रामचरण निर्मलकर ने बैंडिट क्वीन में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इन्हें संगीत नाटक अकादमी का

अभिनय पुरस्कार प्रदान किया गया है।

छत्तीसगढ़ में कमला देवी संगीत महाविद्यालय रायपुर के प्रेक्षागृह रंगमंदिर के बनने के पश्चात छत्तीसगढ़ में रंगकर्म

में विशेष तेजी आयी और भिलाई के सुब्रत बोस ने पहली बार (राज्य) में रायपुर में नुक्कड़ नाटक खेला था।

वर्तमान में सबसे ज्यादा रंगमंच संस्थाएं- भिलाई में कार्यरत हैं।

श्रीमति मीरा चौधरी बस्तर संभाग के रंगमंचीय क्षेत्र में अभिनय करने वाली प्रथम महिला हैं।

वर्तमान में कई छत्तीसगढ़ी फिल्मे बन रही है जो काफी देखी  जा रही हैं।

 

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