Basant Panchami2021-माघ शुक्ला पंचमी-बसंत पंचमी (सरस्वती जयन्ती)

बसंत पंचमी Basant Panchami Essay-माघ शुक्ला पंचमी-(सरस्वती जयन्ती) बसंतोत्सव के नाम से यह त्यौहार स्कूल जीवन में खासा महत्व रखता है ,आइये हम इसके बारे में 

बसंत पंचमी निबंध (सरस्वती जयन्ती) Basant Panchami Essay


इस बसंत पंचमी basant panchami का उत्सव माघ माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है।

शरद ऋतु के पश्चात् ऋतुराज बसंत की सभी को बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है।

बसंत ऋतु के आगमन के स्वागतार्थ चारों तरफ बड़े धूम-धाम से तैयारियाँ होती हैं। धरती माँ फूलों से अपना श्रृंगार करती है।

पेड़-पौधे, पत्ते रूपी नये वस्त्र धारण करते हैं।
यह बसंत ऋतु में प्रकृति अपने पूर्ण यौवन पर रहती है। वन-वाटिकाओं में अद्भुत सुन्दरता दिखाई देती है। पौधों पर नई-नई कोपलें आ जाती हैं, पुष्प खिल जाते हैं और उनकी महक से चारों ओर का वातावरण सुगन्धित हो जाता है।

खेतों में सरसों के फूल खिल उठते हैं। जिनकी पीतिमा से और हरियाली से मन प्रफ्फुलित हो उठता है।

तालाबों में कमल खिलने लगते हैं आमों पर मौर निकल आते हैं, चारों ओर सुगन्धित बयार बहने लगती है। वन-वाटिकाओं में पक्षियों के कलरव, कोयल की कूँक में मनोमुग्धकारी स्वर सुनाई देते हैं। बागों में भंवरों के गुंजन और तितलियों के उल्लासमय नृत्य प्रारम्भ हो जाते हैं।


प्राचीन भारत में इसे बसन्तोत्सव के रूप में मनाया जाता था। सम्भवतः इसलिए क्योंकि यह वह समय होता है जब धरती पुत्र किसानों के दिन फिरने लगते हैं।

धान की फसल उनके लिए लक्ष्मी के रूप में तैयार रहती है। खेत-खलिहान की चिन्ता से निश्चित होकर खुले हृदय से ऋतुराज का स्वागत किया जाता है। यह एक ऐसा उत्सव है जिसे गरीब, अमीर, सभी वर्ग के लोग हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। बसंत पंचमी का सम्बन्ध सरस्वती देवी से माना जाता है।

सरस्वती जयन्ती

सरस्वती विद्या, संगीत और बुद्धि की देवी मानी जाती है। प्राचीन साहित्य में उन्हें वाग्देवी, वाणी, शारदा, भारती, वीणापाणि, तुम्बरी और सर्व मंगली आदि नामों से पुकारा गया है। आदि शक्ति के त्रिगुणमयी रूपों में सत्वप्रधान रूप सरस्वती का है।


इस दिन बसंत और रति सहित कामदेव की पूजा का विधान भी है और वसन्त राग सुनने का बड़ा माहात्म्य है। वसंत राग शिव के पाँचवें मुख से उत्पन्न बताई जाती है, जिसे वसंत ऋतुमें ही गााने का विधान है।


इसी तिथि को समुद्र से लक्ष्मी का जन्म हुआ था, अतः इसे श्री पंचमी भी कहते है और इस दिन केवल एक बार भोजन कर आधा व्रत करते हैं, कोई कोई एक ही पदार्थ का भोजन करते हैं ।

विद्यालयों में सरस्वती पूजन, एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाना चाहिए। इस अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसे संगीत, नृत्य, काव्यपाठ, भाषण कला, चित्रकला आदि का आयोजन किया जाना चाहिए।

इससे छात्रों का कलाओं के साथ भावात्मक जुड़ाव होता है और उनकी क्षमताएँ उजागर होती हैं।

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सरस्वती वन्दना


या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावर दण्ड मण्डित करा या श्वेत पद्मासना।।
या ब्रह्माच्युत शंकर प्रमृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा।।
शुक्ला ब्रह्म विचार सार परमाद्यां जगद् व्यापिनीं।
वीणा पुस्तक धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारा पहाम्।
हस्ते स्फटिक मालिका विधतीं पद्मासने संस्थिताम् ।
वन्देत्ता परमेश्वरी भगवती बुद्धि प्रदां शारदाम् ।।

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